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आतंक के गढ़ पाकिस्तान में मानवाधिकार की बात भी बेमानी, सुरक्षित नहीं अल्पसंख्यकों की बहू-बेटियां

बैग न्यूज़ भारत

संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार व कश्मीर का मुद्दा उठाकर बार-बार मुंह की खाने वाले पाकिस्तान में शायद शर्म जैसी कोई बात रह नहीं गई है। दुनिया जानती है कि आतंक के गढ़ पाकिस्तान में कानून और मानवाधिकार जैसी कोई व्यवस्था प्रभाव में नहीं रही। अल्पसंख्यक हिंदू, सिख व ईसाई समाज की दशा तो दयनीय है ही, शिया मुसलमान भी हमेशा दहशत में रहते हैं। गुलाम कश्मीर के आंदोलनकारियों की तो पाकिस्तानी सेना व खुफिया विभाग के अधिकारी ही हत्या करवा देते हैं।

नौकरी के लिए भी धर्मांतरण की शर्त : अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की इंतहा देखिए कि उन्हें पाकिस्तान में नौकरी पाने के लिए भी धर्म बदलना पड़ता है। इसी साल जून में सिंध प्रांत के बादिन जिले में कई हिंदू परिवारों के जबरन धर्मांतरण का मामला सामने आया था। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने धर्मांतरण कराए जाने वाले सावन भील व उनके परिजनों के हवाले से रिपोर्ट छापी थी। सावन भील का नाम असलम शेख कर दिया गया है। असलम ने बताया था कि उन्हें नौकरी चाहिए थी। जब उन्होंने नौकरी पाने की कोशिश की तो उनके सामने धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई। मजबूरन उन्हें वह शर्त माननी पड़ी।

सुरक्षित नहीं अल्पसंख्यकों की बहू-बेटियां : पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की बहू-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। कट्टरपंथी संगठनों के इशारे पर वहां के अल्पसंख्र्य हिंदू, सिख व ईसाई समाज की नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके उनका जबरन धर्मांतरण व निकाह करा दिया जाता है। पुलिस भी कट्टरपंथियों का ही साथ देती है। इसके कारण अल्पसंख्यकों की आवाज दब जाती है। गत दिनों एक रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तान में हर साल करीब एक हजार से भी ज्यादा अल्पसंख्यक नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके उनका जबरन धर्मांतरण व निकाह करा दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-19 के बीच भारत में शरर्णािथयों की संख्या में 17 फीसद का इजाफा हुआ है। इनमें बड़ी संख्या पाकिस्तान से आने वाले वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों की है।

मानवाधिकार आयोग भी जता चुका है चिंता : पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने मई में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2019 में पाकिस्तान का मानवाधिकार के मामलों में रिकॉर्ड बेहद चिंताजनक रहा। इस दौरान राजनीतिक विरोधियों के दमन के साथ-साथ मीडिया पर भी प्रतिबंध लगाए गए।

आयोग के अनुसार, बलूचिस्तान की खदानों में बाल श्रमिकों के यौन शोषण के समाचार सामने आए, जबकि हर पखवाड़े बच्चों से दुष्कर्म और उनकी हत्या की खबरें आम हैं। अल्पसंख्यक देश के संविधान के तहत प्रदत्त धार्मिक आजादी का लाभ उठा पाने में अक्षम हैं।

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