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मनमोहन सिंह को कैसे याद करते हैं उनके गांव के लोग, जो अब पाकिस्तान में है

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ये एक शर्मीले से लड़के की कहानी है. जिसकी जेब में हरदम मेवा भरा रहता था.

1932 का साल.
पतझड़ का मौसम.
जगह- जिला झेलम.
गांव का नाम गाह
.

गांव के चारों तरफ, मीलों तक फैले हरे खेत. फसल पकती, तो सब धूसर-भूरा हो जाता. इसी गांव की बात है. जो अब पाकिस्तान में है. तारीख मालूम नहीं, कौन सी थी जब वो बच्चा पैदा हुआ था. (हालांकि बाद में दादी स्कूल में नाम लिखाने गईं. तब 27 सितंबर लिख दिया गया.) पैदाइश के वक़्त घर में जमा तीन लोगों की मौजूदगी. दादा संत सिंह. दादी जमना देवी. और जन्म देने वाली जिला कैंपबेलपुर के चकरी गांव की उसकी मां अमृत. पिता गुरमुख सिंह दूर 350 किलोमीटर दूर पेशावर के अपने दफ़्तर में थे. नौकरी थी उनकी एक फर्म में. काम, कमीशन एजेंट. ये फर्म अफगानिस्तान से मेवे मंगवाती और उसे पंजाब भर में सप्लाई करती.

बच्चे की पैदाइश की ख़बर सुनकर गुरमुख गांव आए. बीवी अमृत और बच्चे को लिवाकर गए पंजा साहिब. सिख मानते हैं, यहां गुरु नानक के पंजे का निशान बना है. जैसी कि रीत है सिखों में, वहां ग्रंथी साहब ने गुरु ग्रंथ साहब का पन्ना खोला. जो पन्ना खुला, उसका सबसे पहला शब्द था म. और यूं बच्चे का नाम रखा गया- मनमोहन. लोग प्यार से उसको मोहना पुकारते. इससे पहले कि मोहन मां की कोई याद सहेज पाता, अमृत गुजर गईं. उन्हें टायफाइड हुआ था. परिवार के लोग कहते हैं. आख़िरी बार जब अमृत पेशावर गईं, तो रास्ते में उनकी सुराही गिरकर टूट गई. तब किसी को कुछ खास नहीं लगा. मगर अमृत के गुजरने के बाद लोग समझे. कि शायद सुराही का टूटना चेतावनी थी. कि अब वो कभी गांव का मुंह नहीं देख सकेगी.

मनमोहन. पूरा नाम- मनमोहन सिंह.

मोहन दादा-दादी के साथ बड़ा हुआ. संत सिंह के पास नाम की जमीन थी. 20वीं सदी की शुरुआत में सरकार एक कानून लाई थी. इस कानून के कारण पांरपरिक तौर पर खेती न करने वाली जातियां खेती के लिए जमीन नहीं खरीद सकती थीं. ऊपर से संत सिंह निरक्षर. इधर-उधर छोटा मोटा काम करते गुजारा करते. अमृत के गुजरने के बाद गुरमुख के लिए अकेले पेशावर में मोहन को पालना मुश्किल हो गया. सो उन्होंने मोहन को गाह भेज दिया. पिता से कहा, आप इसका ध्यान रखो. मैं हर महीने पैसे भेजूंगा. गुरमुख बस पैसे नहीं भेजते. ढेर सारा मेवा भी भेजा करते टाइम-टाइम पर. इतना कि मोहन की जेब में हर समय बादाम और किशमिश भरा रहता. सालों बाद भी गांव के उनके पड़ोसियों को मोहन यूं ही याद रहने वाला था- अरे वो मोहन, हां हां वो न जिसकी जेब में मेवा भरा रहता था.

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