Health

सावधान रहें! बेबी डायपर में बेहद ख़तरनाक और जहरीले केमिकल्स के अंश मिले हैं

Bag news –

एक रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन है- Toxics Link. भारत का ही है. दिल्ली में दफ्तर है. ये उन तमाम फैक्टर्स पर शोध करते हैं, जो किसी न किसी तरीके से जलवायु को या हमारे जीवन को प्रदूषित कर रहे हैं. इन्होंने हाल ही में एक रिसर्च किया है ‘बेबी डायपर्स’ पर. इस रिसर्च के मुताबिक, बच्चों के डायपर में जहरीले केमिकल्स पाए गए हैं.


बेबी डायपर्स में एक बेहद ख़तरनाक केमिकल्स के अंश पाए जाते हैं. ये केमिकल है- थैलेट्स (Pathalates). चूंकि बच्चे काफी देर तक डायपर पहने रहते हैं, तो इस बात का खतरा रहता है कि ये थैलेट्स रिसकर उनकी स्किन के संपर्क में आएंगे. थैलेट्स से क्या ख़तरा रहता है? मेटाबॉलिक डिसऑर्डर, डायबिटीज़, लिवर डिसऑर्डर और कैंसर तक.

रिसर्च के लिए टॉक्सिक्स लिंक ने डायपर्स बनाने वाली 19 कंपनियों के 20 सैंपल इकट्ठा किए. वैरायटी रखने के लिए इनमें से कुछ ई-कॉमर्स साइट से मंगवाए, कुछ बाजार से खरीदे. फिर इनकी लैब टेस्टिंग कराई. उसी के आधार पर थैलेट्स की मौजूदगी की पुष्टि हुई.


क्या है थैलेट्स?


थैलेट्स एक किस्म के केमिकल्स होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक को फ्लेक्सिबल, ड्यूरेबल, सॉफ्ट और ट्रांसपेरेंट बनाने के लिए किया जाता है. डायपर्स में भी प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, और इनमें थैलेट्स का. लेकिन जब बच्चे ये डायपर पहनते हैं तो नमी पाकर ये थैलेट्स आसानी से डायपर से मुक्त हो जाते हैं और सीधे स्किन के संपर्क में आ जाते हैं.

थैलेट केमिकल का एक टाइप होता है- DEHP. ये सबसे ख़तरनाक होता है. बच्चों के किसी भी प्रॉडक्ट में इसका इस्तेमाल न करने की नसीहत दी जाती है. यूरोपियन यूनियन के देशों में, अमेरिका में तो ये बैन भी है. लेकिन जिन बेबी डायपर्स पर रिसर्च किया गया, उसमें DEHP की मौजूदगी पाई गई.

इसकी मात्रा 2.36ppm से लेकर 264.94 ppm तक पाई गई, जो कि काफी ज़्यादा है. PPM माने पार्ट्स पर मिलियन.

डायपर में सबसे ख़तरनाक


डायपर हमेशा बच्चों के जननांगों के संपर्क में रहते हैं. जब इनमें से थैलेट रिसता है, तो जननांगों के रास्ते वो आसानी से शरीर में प्रवेश कर सकता है. रिसर्च में बताया गया है कि थैलेट्स ज़्यादा मात्रा में शरीर में जमा हो जाए तो कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं? लिवर/किडनी/लंग्स की दिक्कत, कैंसर, रीप्रोडक्टिव सिस्टम में दिक्कत, फर्टिलिटी इश्यूज़, न्यूरो डेवलपमेंट इश्यू, मेटाबॉलिक डिसऑर्डर, डायबिटीज़ और ऑटिज़्म तक.

यही नहीं, अधिकतर घरों में डायपर्स को खुले में ही फेंक भी दिया जाता है. या हम इसे डस्टबिन में फेंक देते हैं, कूड़ा वाला उठाकर ले जाता है और फिर वहां से खुले में फेंक दिया जाता है. डायपर से रिसने वाला थैलेट्स जब पर्यावरण के संपर्क में आता है तो पर्यावरण को भी प्रदूषित करता है. थैलेट्स के कण हवा में मिलते हैं और फिर सांस के माध्यम से शरीर में पहुंचते हैं.

पहली बात तो ये कि ऐसा नहीं है कि भारत में ही सबसे पहले डायपर्स पर इस तरह की रिसर्च हुई हैं. कई यूरोपीय देशों में डायपर पर रिसर्च हुए हैं. लेकिन भारत में जो डायपर मार्केट में हैं, उनमें से कई में DEHP थैलेट्स की मात्रा बाकी देशों से ज़्यादा पाई गई. यूरोपीय देशों में इसके इस्तेमाल को लेकर कड़े निर्देश हैं. चीन और साउथ कोरिया जैसे देशों में भी थैलेट्स के इस्तेमाल को रेग्युलेट किया जाता है. लेकिन भारत में अब तक ऐसा कोई रेग्युलेशन, कोई गाइडलाइंस नहीं हैं.

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