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AIIMS के डायरेक्टर ने कहा- ठंड में प्रदूषण बढ़ने से कोरोना वायरस के मामले भी बढ़ जाएंगे

Bag news –

डॉक्टर रणदीप गुलेरिया. AIIMS के डायरेक्टर हैं. उनका कहना है कि प्रदूषण के लेवल में थोड़ी बहुत भी बढ़ोत्तरी होने से, कोरोना वायरस के मामले भी बढ़ेंगे. उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ को दिए एक इंटरव्यू में ये बात कही. डॉक्टर गुलेरिया का कहना है कि ठंड के मौसम में सावधान रहना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा,

“चूंकि वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ा है, चीन और इटली में हुई कुछ स्टडीज़ के मुताबिक, ऐसे आंकड़े सामने आए हैं, जो ये दिखाते हैं कि उन इलाकों में जहां पीएम 2.5 के स्तर में थोड़ी भी वृद्धि हुई है, वहां कोरोना के करीब 8 से 9 फीसद मामले बढ़े हैं.”

डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने आगे कहा,

“वायु प्रदूषण से फेफड़ों में सूजन आ जाती है और SARS-COV-2 भी मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है, जिससे सूजन होती है. ये संभावना है कि ऐसे समय में गंभीर संक्रमण हो सकता है, खासतौर पर इंडो-गैंगेटिक प्लेन्स (भारत-गंगा के मैदानी इलाके) में, जहां प्रदूषण का स्तर ज्यादा है.”

ठंड में कैसे फैल सकता है संक्रमण?

डॉक्टर गुलेरिया कहते हैं कि ठंड में लोग घरों के अंदर ज्यादा रहते हैं, अधिक भीड़ हो सकती है और ऐसे में संक्रमण एक से दूसरे में फैल सकता है. उन्होंने आगे कहा,

“सर्दियां वैसे भी रेस्पिरेटरी (सांस संबंधी) वायरस का सीज़न होता है, ऐसे में मामलों में भी वृद्धि देखी जा सकती है. संक्रमण पर हमारी निगरानी से मिले आंकड़े ये दिखाते हैं कि इंफ्लुएंजा जैसी बीमारियों को लेकर भारत में दो बार पीक यानी उछाल आता है, एक मानसून सीज़न में, दूसरा सर्दियों में. कोविड-19 भी रेस्पिरेटरी वायरल इन्फेक्शन है और लगभग इंफ्लुएंजा की तरह ही बर्ताव करता है.”

कैसे बचा जाए इनसे?

एम्स के डायरेक्टर का कहना है कि तीन मुख्य पिल्लर्स की बदौलत कोरोना वायरस के संक्रमण को कम किया जा सकता है. वो हैं- मास्क, फिजिकल डिस्टेंसिंग और हैंड हाइजीन. डॉक्टर गुलेरिया कहते हैं कि इन तीनों का पालन अगर सही से हो तो कोरोना के मामले 30 से 40 फीसद तक कम हो सकते हैं. कई त्यौहार भी आ रहे हैं. इस पर डॉक्टर गुलेरिया ने कहा,

“त्यौहार के सीज़न में भीड़ बढ़ने के काफी ज्यादा चांस हैं. इसलिए इस साल त्यौहार मनाते समय थोड़ा संयम बरतें.”

कोरोना की वैक्सीन पर डॉक्टर गुलेरिया से जब पूछा गया कि किसे प्राथमिकता मिलेगी. इस पर उन्होंने कहा,

“यहां वैक्सीन को लेकर न्याय संगतता होनी चाहिए, जिसे भी ज़रूरत हो उसे पहले मिलनी चाहिए, फिर भले ही वो कोई भी हो. वैक्सीन की प्राथमिकता वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए. जिनकी मृत्यु दर अधिक है, उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए. क्योंकि हमें मृत्यु दर और कोरोना वायरस संक्रमण में कमी की तरफ देखना है.”

वायु प्रदूषण को लेकर हुई थी ज़रूरी स्टडी

22 सितंबर को ‘लैंसेट’ में एक स्टडी पब्लिश हुई थी. टाइटल था- चीन और यूरोप में कोविड-19 लॉकडाउन से वायु प्रदूषण में हुई कमी का सेहत पर शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म प्रभाव: एक मॉडलिंग स्टडी’

इस स्टडी में ये पाया गया था कि- वायु प्रदूषण में कमी लाने की निरंतर रणनीतियां, न केवल कोविड-19 महामारी के वक्त मृत्यु-दर कम करने में मददगार हैं, बल्कि भविष्य में भी रेस्पिरेटरी डिसीज़ यानी सांस संबंधी बीमारियों के दौरान होने वाली मौत की दर कम करने में भी मददगार हैं. चूंकि खराब क्वालिटी की हवा में रहने वाले लोगों को पहले से ही सांस संबंधी दिक्कत होती है, ऐसे में अगर वो संक्रमण की चपेट में आ जाएं, तो वो और कमज़ोर हो जाते हैं और अंत में मौत की दर में बढ़ोतरी हो जाती है.

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